पासी समाज में एक दिलचस्व बात ये है कि अपने पूर्वजों का इतिहास और वीर गाथा एक पीढ़ी दूसरे पीढ़ी को बताता रहा, पीढ़ी पर पीढ़ी लोक कथाओं में पासी राजाओं और वीरता के गाथा हमेशा जिंदा रहा है चाहे लोक गीत हो या एक पासी इतिहास को बताने वाले पासी समूह है जो साल में सभी के घर घर जाकर पासी राजाओं के वीरता और पासी राजा महाराजाओं के कहानी लोक कथाओं और गीत के माध्यम से बताता है! भारत के भारशिव नागवंशी पासी समाज का इतना गौरवशाली इतिहास देश और दुनियाँ के लोगो से छिपाने का क्या उद्देश्य था ये कांग्रेस और वामपंथी इतिहासकार ही जाने!
महाराजा त्रिलोकचंद्र पासी उत्तर भारत, खासकर अवध (आज का उत्तर प्रदेश) के एक प्रसिद्ध पासी राजा थे, जिन्हें पासी समाज के गौरवशाली इतिहास के राजवंशों में गिना जाता है। कौन थे और किस वंश से?वे भारशिव (राजपासी,पासी(भरपासी) राजवंश के राजा माने जाते हैं, जो प्राचीन अवध क्षेत्र में लंबे समय से प्रभावशाली था। कुछ स्रोतों के अनुसार उनका शासनकाल लगभग 10वीं–11वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है (कुछ में 918 ई. का उल्लेख मिलता है)। राज्य, विजय और राजधानीमान्यता है कि त्रिलोकचंद्र पासी ने विखंडित पासी शक्तियों को फिर से एकजुट कर एक मजबूत राजवंश खड़ा किया और अवध, दिल्ली तथा पहाड़ी क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित किया। उन्होंने बहराइच को अपनी राजधानी बनाया और वहाँ से अपने राज्य का प्रशासन चलाया, जिसे आधुनिक पासी इतिहासकार उनकी महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि मानते हैं। वीरता और दिल्ली विजय की कथाकई लोक‑परंपराओं और सामुदायिक कथाओं में उन्हें “दिल्ली विजेता” या दिल्ली पर आक्रमण करने वाले वीर राजा के रूप में बताया जाता है; कहा जाता है कि उन्होंने दिल्ली के राजा विक्रम पाल (विक्रम चौहान) के खिलाफ युद्ध लड़ा और उसे पराजित किया। कुछ लोकगीतों और वीडियो‑कथाओं में उन्हें “राजपासी” उपाधि देने वाला और अपने समाज को संगठित करने वाला नेता बताया गया है। सांस्कृतिक और धार्मिक पहलूउन्हें सूर्य‑उपासक बताया जाता है; कुछ स्रोतों में उल्लेख है कि उन्होंने बहराइच के पास बालाघाट में भगवान सूर्य का मंदिर बनवाया था। उनके नाम से जुड़ी गाथाएँ आज भी पासी समाज में गाई जाती हैं और उन्हें वीरता, दान और धर्म‑निष्ठा का प्रतीक माना जाता है।
महाराजा त्रिलोकचंद्र पासी से जुड़ी लोक‑गाथाओं और राजपासी उपाधि की कहानी बहुत दिलचस्प है, खासकर पासी समाज के सांस्कृतिक इतिहास में। राजपासी / राजबंसी उपाधि कैसे आई?कई पासी‑इतिहासकार और सामुदायिक स्रोत बताते हैं कि त्रिलोकचंद्र ने अपने वंश को अधिक गौरव देने के लिए एक नई उपाधि चलाई, जिसे बाद में “राजपासी” या “राजबंसी/रजपासी” के रूप में जाना गया। कहा जाता है कि उन्होंने अपने भर/पासी वंश को सूर्यवंशी राजपूतों की तरह “अर्क‑वंश” (सूर्य‑वंश) से जोड़ा और अपने नजदीकी परिवार को “राजपा” या “राजपासी” उपाधि दी, जिससे उनके वंशजों को “राजपासी” कहा जाने लगा। लोक‑गीत और वीरगाथाएँत्रिलोकचंद्र पासी की वीरता, दिल्ली विजय और बहराइच के सूर्य‑मंदिर की कथा को आज भी लोक‑गीतों और गाथाओं में गाया जाता है; ये गीत उन्हें वीर, दानी और धर्मनिष्ठ राजा के रूप में चित्रित करते हैं। कुछ आधुनिक लोक‑गीतों और शॉर्ट्स में उन्हें “दिल्ली विजेता सम्राट त्रिलोक चंद्र पासी” के नाम से पुकारा गया है, जिसमें उनकी सेना, दिल्ली युद्ध और बहराइच राजधानी का ज़िक्र है। सांस्कृतिक महत्वराजपासी उपाधि और अर्क‑वंश की कल्पना ने पासी समाज में एक तरह की राजवंशी पहचान बनाई, जिसे आज भी कई परिवार “राजपासी” या “राजबंसी” के नाम से अपनाते हैं। इन गाथाओं और उपाधियों के ज़रिए त्रिलोकचंद्र पासी सिर्फ एक राजा नहीं, बल्कि पासी समाज की वीरता, संगठन और सांस्कृतिक गरिमा का प्रतीक बन गए हैं।
अभय चंद्र पासी (या अभय चन्द्र पासी) उत्तर भारत के प्राचीन पासी राजवंश के एक राजकुमार/राजा माने जाते हैं, जो महाराजा सातन पासी के पुत्र थे। कौन थे और किस वंश से?सातन पासी के दो पुत्र थे: एक त्रिलोक चन्द्र और दूसरा अभय चन्द्र (अभय पासी)। अभय चन्द्र ने उन्नाव जिले के पुरवा तहसील में डोडिया खेड़ा नामक स्थान को बसाया, जो आज भी उनसे जुड़ी एक प्रमुख बस्ती मानी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भइस परिवार (सातन पासी → त्रिलोक चन्द्र और अभय चन्द्र) का ज़िक्र कुछ पौराणिक और आधुनिक पासी‑इतिहास स्रोतों और गजेटियर‑आधारित संक्षिप्त विवरणों में मिलता है, जहाँ इन्हें भारशिव‑पासी राजवंश के राजकुमारों के रूप में बताया गया है। कुछ आधुनिक वीडियो और सोशल‑मीडिया सामग्री अभय पासी को “बैस राजपूत” उपाधि देने वाले या बैस राजपूतों की उत्पत्ति से जोड़ने वाले राजा के रूप में पेश करते हैं, लेकिन यह दावा ज़्यादातर लोक‑कथा और आधुनिक राजनीतिक‑सामाजिक नैरेटिव पर आधारित है, न कि स्पष्ट दस्तावेज़ी इतिहास पर। सांस्कृतिक महत्व अभय पासी को आज कई पासी समुदाय‑कथाओं में डोडिया खेड़ा के संस्थापक और सातन पासी के वीर वंशज के रूप में याद किया जाता है। उनका नाम अक्सर त्रिलोक चन्द्र पासी के साथ जोड़कर लिया जाता है, ताकि पासी राजवंश की एक लंबी शाखा (सातन → त्रिलोक + अभय) को समझा जा सके।
महाराजा सातन पासी कौन थे??
महाराजा सातन पासी और महाराजा बिजली पासी दोनों घने मित्र थे दोनों के परिवारिक संबंध थे दुःख हो या सुख दोनों एक दूसरे के साथ खड़े रहते थे!
महाराजा बिजली पासी पे आल्हा और ऊदल दोनों भाई ने हमला किया था तब महाराजा सातन पासी ने महाराजा बिजली पासी और उनके परिवार को बचाने के लिए आए थे लोक कथाओं में आज भी पासी समाज के इतिहास जिन्दा है जिसी गांजर का युद्ध भी कहते हैं उसमें जयचंद्र के बेटा मारा गया था साथ ही आल्हा और ऊदल के दो साले योगा और भोगा भी मारा गया था, सातन पासी इतना वीर थे कि आल्हा और ऊदल भी नहीं टिक सका वह ऐसा घायल हुए कि उन दोनों को आगे चलकर मृत्यु हो गई, आल्हा और ऊदल के बेटे इंदल अपने पिता और चाचा को बचाने के लिए आया था किसी तरह मौका मिलते ही घायल अवस्था में लेकर भगा तब भी जान नहीं बचा पाई थी

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