महाराजा सुहेलदेव पासी समाज के राजा है! महाराजा सुहेलदेव पासी का इतिहास चोरी करने के लिए राजहर ने एक साजिशन रची, सबसे पहले कहार, बियार,बिंद, राजहर इत्यादि मिलकर एक टाइटल बनाया उसका नाम रखा राजहर से राजभर और इनलोगों का चालाकी देखे नई टाइटल को जो बनाया उसी को जाति बता दिया फिर पासी समाज के उपजाति राजपासी,राजवंशी,अर्कवंशी, कमानी, त्रिशूलिया, व्याधा,खटीक,गुज्जर,रावत,कैथवास, भरपासी इत्यादि! उसी में एक भरपासी है वहीं भर पे दावा ठोक दिया है!
इतिहास के शोध करने से पता चलता है कि पासी समाज नागो में नौ नाग भारशिव नागवंशी है! ये भी कर्वी सच है कि ये देश में नागो का शासन रहा है और पद्मावत में सिक्के मिले उसमें ताड़ के पेड़ और नाग का फोटो है जो पासी समाज के लोग आज भी ताड़ के पेड़ से जुड़े हैं! पासी समाज का ऐतिहासिक सबूत इतना मिलता है कि झुठलाया नहीं जा सकता वही राजहर का उत्पत्ति का कोई सबूत नहीं मिलता इसका अतीत का भी पता नहीं है, इसलिए राजहरो ने अपने अतीत को न पता देख पासी समाज के भारशिव नागवंशी के पूर्वजों पे ही दावा ठोक दिया है!
अब ये पासी समाज की कमजोड़ी है जो ऐसे लोगों को छोड़ रखा है BJP का तो मजबूरी है कि पूर्वाचल में भी सीट चाहिए, लेकिन BJP को ये भी पता है अवध क्षेत्र में पासी समाज का वोट सभी पे भाड़ी है 150 से ज्यादा विधानसभा सीट प्रभावित करता है, 100 सीट ऐसी है कि पासी बहुल विधानसभा है! वहीं लोकसभा 50 से 60 सीटों पे पासी वोट प्रभावित करता है! 32 से 36 सीट पे पासी बहुल लोकसभा सीट है!
कहार, बिंद,राजहर, बियार OBC के जाति में 2% के करीब माना जाता है वहीं पासी समाज पूरा उत्तर प्रदेश में 8% से 9% की जनसंख्या है!
महाराजा सुहेलदेव पासी के ऊपर विवाद करने और राजनीतिक करने बालों को थोड़ा समझना चाहिए, राजभर कोई जाति नहीं कहार बियार बिन भरुआ इत्यादि मिलकर एक टाइटल बनाया राजहर(राजभर)उसके बाद राजहर लिखना चालू कर दिया और पासी के उपजाति भरपासी पे दावा ठोक दिया,लेकिन इतिहास के पन्ने पे राजहर(राजभर ) का कही उल्लेख नहीं मिलता है और इनलोगों में पासी जैसे लड़ने का न तजुर्बा है और कोई गुण है, आज भी पासी समाज के लोग लड़ाकू है जो कि उनके पूर्वजों की छवि दिखाती है, पासी एक प्राचीन नागवंशी क्षत्रिय समाज है, नागवंशी भारशिव ने पासी की उपाधि धारण किया था बहुत सारे एतिहासिक स्रोत में पासी समाज के अतीत को बताता है, एक बात ये भी सोचने वाली है पासी समाज अवध बहुल है सारा इतिहास अवध का है जहां पे राजहर कही दूर दूर तक नहीं दिखाता है जहां जहां पासी राजाओं का दावा है वहां वहां सिर्फ पासी मिलता है!
सालार मसूद और सुहेलदेव पासी की कथा फारसी भाषा के मिरात-ए-मसूदी में पाई जाती है। यह मुगल सम्राट जहाँगीर (1605-1627) के शासनकाल के दौरान अब्द-उर-रहमान चिश्ती ने लिखी थी। पौराणिक कथा के अनुसार, सुहेलदेव श्रावस्ती के राजा के सबसे बड़े पुत्र थे। पौराणिक कथाओं के विभिन्न संस्करणों में, उन्हें सकरदेव, सुहीरध्वज, सुहरीदिल, सुहरीदलध्वज, राय सुह्रिद देव, सुसज और सुहारदल समेत विभिन्न नामों से जाना जाता है।[1]
महमूद ग़ज़नवी के भतीजे सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी ने 16 वर्ष की आयु में सिंधु नदी को पार कर भारत पर आक्रमण किया और मुल्तान, दिल्ली, मेरठ और अंत में सतरिख पर विजय प्राप्त की। सतरिख में, उन्होंने अपने मुख्यालय की स्थापना की और स्थानीय महाराजा लाखन पासी और राजपासी राजा कंस को हराने के लिए सेनाओं को भेज दिया। लखनऊ को बसाने वाले महाराजा लाखन पासी और राजपासी राजा कंस मिलकर हातिम और खातिम से घनघोर युद्ध लड़ा जिसके बाद कसमांडी के राजपासी राजा कंस ने हातिम और खातिम को जिन्दा जला के मार दिया था उसके बाद गाजी का सेना कमजोड़ हुआ उसी का फायदा उठा के महाराजा सुहेलदेव पासी ने गाजी को काटा था, सैयद सैफ-उद-दीन और मियाँ राजब को बहराइच को भेज दिया गया था। बहराइच के स्थानीय राजा और अन्य पड़ोसी हिंदू पासी राजाओं ने एक संघ का गठन किया लेकिन मसूद के पिता सैयद सालार साहू गाजी के नेतृत्व में सेना ने उन्हें हरा दिया। फिर भी उन्होंने उत्पात मचाना जारी रखा और इसलिए सन् 1033 में मसूद खुद बहराइच में उनकी प्रगति को जाँचने आया। #सुहेलदेव_पासी के आगमन तक, मसूद ने अपने दुश्मनों को हर बार हराया। अंत में सन् 1034 में महाराजा सुहेलदेव पासी की सेना ने मसूद की सेना को एक लड़ाई में हराया और मसूद की मौत हो गई।

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