पासी और भर
सबसे पहले यह मालूम होना चाहिए कि भारशिवों का संबंध पासी जाति से कितनी निकटता का है पासी समाज में एक उपजाति ताड़माली है जो उत्तर प्रदेश में तो रहती ही है लेकिन इसका अधिकांश भाग बिहार में बसा हुआ है जो अपने को पासी ताडमाली नाम से संबोधित करता है अब प्रश्न यह उठता है कि पासी ताड़ से इतना प्यार क्यों करता है क्योंकि भारशिवों के सभी सिक्कों पर चाहे उनका वर्णन भारतवर्ष का अंधकार युगीन इतिहास के लेखक केपी जयसवाल जी ने किया हो या अन्य पुस्तकों में सब कहीं उनके सिक्कों पर ताड़ का वृक्ष अनिवार्य रूप से मिलता है नाग बैल त्रिशूल यह तो सिक्कों पर है ही पर ताड़ का वृक्ष उनके सभी सिक्कों पर भारशिव साम्राज्य की निशानी के रूप में विद्यमान है नदियों में गंगा और यमुना है।अब ताड़ का कितना महत्व भारशिव क्यों देते थे इसका ऐतिहासिक पहलू भी है क्योंकि वह अपने सिद्धांत में अडिग थे ताड़ की उच्चता में वह शासन की उच्चता दीखते थे ताड की सांस्कृतिक विरासत मे लेखन रूप में जुड़े हुए थे लेखन कला में सबसे पहले इस्तेमाल में आने वाला ताड़ का पत्ता दक्षिण भारत से लेकर पूरे भारतवर्ष में ताड़ का कारोबार करने वाले व्यक्ति आपको भारत में मिल जाएंगे। वह दक्षिण भारत में चाहे सनार,चेर रहे हो उड़ीसा में चाहे ख्याल रहे हो और उत्तर भारत में चाहे सघन बसे हुए पासी हो सर्वत्र फैले हुए हैं और उनमे ताड़ का अनुराग उनको एक विशिष्ट पहचान दिलाता हैसरकारभी ताडांकित नोटे छापती है इसलिए अगर कोई नाहर जाति भारशिव राज्य का सही प्रतिनिधित्व करती है तो वह पासी ही है जो अपनी प्राचीनता को आज भी अक्षुण्ण रखें हुई है वह तो बुरा हो उस कारखाने में निर्मित मदिरा का जिसने इस प्राकृतिक पेय ताडी को हेय बना दिया नहीं तो ताड़ पेड़ से निकला हुआ एक रस शक्तिवर्धक शौर्य वर्धन और स्वास्थ्य वर्धक हैं और था भी । पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भर से जुड़े हुए तमाम स्थान आज भी पासी बाहुल्य क्षेत्र में फैले हुए हैं जैसे भरखनी भडायाल भरावन भरांव भरडीह बर्राडीह भरिगवां आदि सब हरदोई जनपद में हैं सीतापुर में भरैनी और लखीम पुर में भरवारा ये वही पुरानी भारशिव सभ्यता की निशानी है।इन सब जगहों पर पासी राजा रहे हैं और आज भी उनके किलों के अवशेष देखे जा सकते है इन्हें ही धौरहरा मितौली व संदीला को गजेटियर पासी राजधानी कहता है।
उदाहरणार्थ हम एक लखनऊ की प्रतिनिधि पुस्तक,गुजश्त लखनऊ के पृष्ठ संख्या बयासी का अंश अवलोकन हेतु प्रेषित कर रहा हूं,,,,,
यह भी कहा जाता है कि महाराज युधिष्ठिर के पोते राजा जनमेजय ने यह इलाका मरताज बुजुर्गों ऋषियों और मुनियों को जागीर में दे दिया था जिन्होंने यहां चपे चपे पर अपने आश्रम बनवाई और हरि के ध्यान में मस्रूफ हो गए।
एक मुद्दत के बाद इनको कमजोर देखकर दो नई कौमें हिमालय की तराई से आकर इस मुल्क पर काबिज हो गई जो वह मिलती जुलती और एक ही नस्ल की दो शाखाएं मालूम होती थी एक भर और दूसरी पासी ।लेखक अब्दुल हलीम शरर ।1980-81लखन ऊ।
अब अब प्रश्न यह उठता है कि भर के साथ पासी ही क्यों जुड़ा है राजभर का तो यहां कोई अता-पता ही ही नहीं है खींचातानी से काम नहीं चलता और न चलेगा।
आर्टिकल
-- राजकुमार वर्मा जी
महाराजा त्रिलोकचंद्र पासी से जुड़ी लोक‑गाथाओं और राजपासी उपाधि की कहानी बहुत दिलचस्प है, खासकर पासी समाज के सांस्कृतिक इतिहास में। राजपासी / राजबंसी उपाधि कैसे आई?कई पासी‑इतिहासकार और सामुदायिक स्रोत बताते हैं कि त्रिलोकचंद्र ने अपने वंश को अधिक गौरव देने के लिए एक नई उपाधि चलाई, जिसे बाद में “राजपासी” या “राजबंसी/रजपासी” के रूप में जाना गया। कहा जाता है कि उन्होंने अपने भर/पासी वंश को सूर्यवंशी राजपूतों की तरह “अर्क‑वंश” (सूर्य‑वंश) से जोड़ा और अपने नजदीकी परिवार को “राजपा” या “राजपासी” उपाधि दी, जिससे उनके वंशजों को “राजपासी” कहा जाने लगा। लोक‑गीत और वीरगाथाएँत्रिलोकचंद्र पासी की वीरता, दिल्ली विजय और बहराइच के सूर्य‑मंदिर की कथा को आज भी लोक‑गीतों और गाथाओं में गाया जाता है; ये गीत उन्हें वीर, दानी और धर्मनिष्ठ राजा के रूप में चित्रित करते हैं। कुछ आधुनिक लोक‑गीतों और शॉर्ट्स में उन्हें “दिल्ली विजेता सम्राट त्रिलोक चंद्र पासी” के नाम से पुकारा गया है, जिसमें उनकी सेना, दिल्ली युद्ध और बहराइच राजधानी का ज़िक्र है। सांस्कृतिक महत्वराजपासी उपाधि और अर्क‑वंश की कल्पना ने पासी समाज में एक तरह की राजवंशी पहचान बनाई, जिसे आज भी कई परिवार “राजपासी” या “राजबंसी” के नाम से अपनाते हैं। इन गाथाओं और उपाधियों के ज़रिए त्रिलोकचंद्र पासी सिर्फ एक राजा नहीं, बल्कि पासी समाज की वीरता, संगठन और सांस्कृतिक गरिमा का प्रतीक बन गए हैं।
अभय चंद्र पासी (या अभय चन्द्र पासी) उत्तर भारत के प्राचीन पासी राजवंश के एक राजकुमार/राजा माने जाते हैं, जो महाराजा सातन पासी के पुत्र थे। कौन थे और किस वंश से?सातन पासी के दो पुत्र थे: एक त्रिलोक चन्द्र और दूसरा अभय चन्द्र (अभय पासी)। अभय चन्द्र ने उन्नाव जिले के पुरवा तहसील में डोडिया खेड़ा नामक स्थान को बसाया, जो आज भी उनसे जुड़ी एक प्रमुख बस्ती मानी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भइस परिवार (सातन पासी → त्रिलोक चन्द्र और अभय चन्द्र) का ज़िक्र कुछ पौराणिक और आधुनिक पासी‑इतिहास स्रोतों और गजेटियर‑आधारित संक्षिप्त विवरणों में मिलता है, जहाँ इन्हें भारशिव‑पासी राजवंश के राजकुमारों के रूप में बताया गया है। कुछ आधुनिक वीडियो और सोशल‑मीडिया सामग्री अभय पासी को “बैस राजपूत” उपाधि देने वाले या बैस राजपूतों की उत्पत्ति से जोड़ने वाले राजा के रूप में पेश करते हैं, लेकिन यह दावा ज़्यादातर लोक‑कथा और आधुनिक राजनीतिक‑सामाजिक नैरेटिव पर आधारित है, न कि स्पष्ट दस्तावेज़ी इतिहास पर। सांस्कृतिक महत्व अभय पासी को आज कई पासी समुदाय‑कथाओं में डोडिया खेड़ा के संस्थापक और सातन पासी के वीर वंशज के रूप में याद किया जाता है। उनका नाम अक्सर त्रिलोक चन्द्र पासी के साथ जोड़कर लिया जाता है, ताकि पासी राजवंश की एक लंबी शाखा (सातन → त्रिलोक + अभय) को समझा जा सके।
महाराजा सातन पासी कौन थे??
महाराजा सातन पासी और महाराजा बिजली पासी दोनों घने मित्र थे दोनों के परिवारिक संबंध थे दुःख हो या सुख दोनों एक दूसरे के साथ खड़े रहते थे!
महाराजा बिजली पासी पे आल्हा और ऊदल दोनों भाई ने हमला किया था तब महाराजा सातन पासी ने महाराजा बिजली पासी और उनके परिवार को बचाने के लिए आए थे लोक कथाओं में आज भी पासी समाज के इतिहास जिन्दा है जिसी गांजर का युद्ध भी कहते हैं उसमें जयचंद्र के बेटा मारा गया था साथ ही आल्हा और ऊदल के दो साले योगा और भोगा भी मारा गया था, सातन पासी इतना वीर थे कि आल्हा और ऊदल भी नहीं टिक सका वह ऐसा घायल हुए कि उन दोनों को आगे चलकर मृत्यु हो गई, आल्हा और ऊदल के बेटे इंदल अपने पिता और चाचा को बचाने के लिए आया था किसी तरह मौका मिलते ही घायल अवस्था में लेकर भगा तब भी जान नहीं बचा पाई थी

Post a Comment