सातन कोट के निकट ही हरदोई जनपद की सन्डीला तहसील है। सन्डीला की स्थापना पासी राजा सलीहा ने की थी। सलीहा पासी के दूसरे भाई मलीहा पासी ने लखनऊ जनपद की तहसील मलीहाबाद की स्थापना की। यह क्षेत्र आज सम्पूर्ण भारतवर्ष में अपने दशहरी आमों के लिए प्रसिद्ध है।
सन्डीला का गणराज्य 14वीं शताब्दी तक सई नदी और गोमती नदी के तटों तक दोआब क्षेत्र में फैला हुआ था। 14वीं शताब्दी के अन्त में दिल्ली के बादशाह सुल्तान नसीरुद्दीन शाह के सेनापति सैयद मखदूम अलाऊद्दीन ने सन्डीला राज्य पर हमला कर दिया। इस युद्ध में राजा सलीहा की हार हुई। इस पराजय के पश्चात् सन्डीला और निकटवर्ती पासी गणराज्यों से पासी राजाओं का अन्त हो गया। पासी गणराज्यों की समाप्ति के फलस्वरुप पासी समाज की राजनैतिक स्थिति बद से बदतर होती गयी। इसके साथ ही पासी जाति के लोग, जो ज्यादातर सेनाओं में योद्धा थे, से उनका कार्य भी छिनता चला गया। कालान्तर में पासी जाति के लोग किसी निश्चित व्यवसाय के न होने के कारण आर्थिक स्थिति से बहुत कमजोर हो गये। फलस्वरूप वे निर्धनता और गरीबी रेखा पर आ पहुंचे।
लखनऊ जो आज उत्तर प्रदेश की राजधानी है, वह कभी राजा बिजली पासी की राजधानी थी। महाराजा बिजली पासी का अवध प्रान्त के एक बड़े भू-भाग पर अपना विशाल साम्राज्य था। प्रसिद्ध अंग्रेजी विद्वान विलियम क्रूक ने लिखा है कि महान राजा राम, जो सूर्यवंशी राजपूत थे, के शासन की समाप्ति के बाद का भारतीय इतिहास बहुत दिनों तक अंधकारमय रहा। आगे जब से इतिहास की जानकारी हुई तो हम पाते हैं कि अयोध्या का विशाल राज्य तीन भागों में बंट गया था। अयोध्या के पूर्व के भू-भाग पर चेरों का कब्जा था। अयोध्या के मध्य भू-भाग पर भर राजाओं का शासन था और अयोध्या के पश्चिमी भू-भाग, जिसमें जनपद बाराबंकी, फैजाबाद, उन्नाव, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, हरदोई, लखनऊ, रायबरेली एवं बहराइच आदि जनपद के परिक्षेत्र सम्मिलित थे, पर पासी राजाओं का आधिपत्य था। विलियम क्रूक की उक्त व्याख्या से स्पष्ट है कि महाराजा बिजली पासी का राज्य लखनऊ और आस-पास के क्षेत्रों में फैला हुआ था। महाराजा बिजली पासी के बारह किलों का विवरण आज भी सरकारी अभिलेखों में मिलता है। ये किले हैं - लखनऊ शहर स्थित महाराजा बिजली पासी किला, बिजनौरगढ़ का किला, नटवाडीह किला, माती किला, परवा पश्चिम किला, कल्ली पश्चिम किला, पुराना किला, औरावां किला, दादूपुर किला, भटगांव किला, ऐन किला एवं पिपरसंड किला।
इसी प्रसंग में श्री वी. सी. शर्मा द्वारा मुद्रित यू.पी. जिला गजेटियर 1959 पृष्ठ 28 का उद्धहरण प्रासंगिक है। श्री शर्मा ने लिखा है कि -
पासी एवं भर राज्य के विस्तार का साक्ष्य प्राचीन टीलों से एकत्र किया जा सकता है क्योंकि लोकमत में उन्हें भर टीला कहा जाता है। ये अमेठी, गोसाईंगंज, महोना एवं मोहनलालगंज तक फैले हैं। नगराम के राजा, बिजनौर के पासी, जिसके आधिपत्य के चलते परगना में पन्द्रह किले थे, काकोरगढ़ के भरपासी राजकुमार, मलिहाबाद के पासी, रामपुर कठवार के कुर्मी सरदार और महोना के मौर्य की कहानियां हाल की हैं।
श्री बी. सी. शर्मा ने इसी गजेटियर में यह भी लिखा है कि जनपद मे भर पासियों का विशाल राज्य था। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि जनपद बहराइच के पासी राजा सुहेलदेव ने काबुल के बादशाह के पुत्र सैयद सालार मसूद गाजी को लड़ाई के मैदान में मार गिराया था। सबसे आश्चर्य तो यह है कि मारे गये हमलावर गाजी मियां के मजार पर आज भी मेला लगता है और भारतीय राजा सुहेलदेव पासी, जिन्होंने हमलावर को परास्त किया था, का आज नामलेवा भी कोई नहीं है। सरकार को कम से कम बहादुर भारतीय राजाओं की यादगार में स्मारक तो बनाना ही चाहिए और उनके इतिहास को मूर्तरूप देना चाहिए।
जनपद बहराइच से लगा जनपद है, लखीमपुर खीरी। खीरी के बहुत बड़े भू-भाग पर पासियों का राज्य रहा है। उ.प्र. गजेटियर, खीरी के पृष्ठ 258 पर अंकित है
धौरहरा की उत्पत्ति ही देवरहा से है, जहाँ पर माता स्थान का ध्वंस मंदिर है। ऐसी परम्परा विख्यात है कि यहाँ पासी राज्य की राजधानी थी। जिला गजेटियर खीरी 1979 के पृष्ठ 20 पर स्पष्ट लिखा है कि-
इस कार्यकाल (9वीं सदी) की शिनाख्त करना गैरवाजिब न होगा कि इसी समय पासी एवं अन्य आदिम जातियों ने देश के भू-भाग को अपने आधीन कर रखा था। हालांकि अब पासियों के शासन काल का कोई चिन्ह शेष नहीं है क्योंकि वह राजपूत और मुस्लिम आक्रमणकारियों के वंशजों के लम्बे अन्तराल तक काबिज रहने के कारण गायब हो गये।
अनुसंधान की कमी के कारण खीरी के तत्कालीन पासी राजाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने में कठिनाई है।
जनपद बहराइच और लखीमपुर से लगा हुआ जिला है, जनपद सीतापुर। सीतापुर जनपद के खैराबाद परगने को बसाने वाले राजा खैरा पासी ही थे। गजेटियर प्राविन्स आफ अवध, वाल्यूम II वर्ष 1877 के पृष्ठ 123 पर लिखा है कि-
ऐसा कहा जाता है कि खैरा पासी ने 11वीं सदी में इस नगर की आधार शिला रखी। खैरा पासी के पूर्व यह स्थान मसिचैत (मसिचित्र) के नाम से जाना जाता था। यह स्थान महान विक्रमादित्य के शासन काल में एक तीर्थस्थल था।
पासी राजाओं, उनके द्वारा निर्मित किलों, उनके सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं धार्मिक स्थिति की जानकारी के लिए आज तक कोई ठोस प्रयास नहीं हुए हैं। इस कारण पासी राज्यों का इतिहास बिखरा पड़ा है। यह कार्य पासी समाज के उत्थान में लगी ऐच्छिक संस्थाओं द्वारा किया जा सकता है। सरकार का भी यह दायित्व बनता है कि वह प्राचीन भारतीय पासी राजाओं के इतिहास पर शोध करवाये और जनता के समक्ष शूरवीर पासी राजाओं के शासन काल विषयक पुस्तकें प्रकाशित करवाये।
आपने जो लेख दिया है, वह **पासी समाज के ऐतिहासिक राजनीतिक इतिहास**, विशेषकर **उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र (हरदोई, सन्डीला, लखनऊ, बहराइच, खीरी, सीतापुर आदि)** में उनके गणराज्यों और राजाओं के बारे में एक बहुत महत्वपूर्ण विवरण है। इसे संक्षेप में समझने के लिए नीचे बिंदुवार सार दिया जा रहा है:
***
## 1. सन्डीला और पासी राजा सलीहा
- **सन्डीला (हरदोई जनपद)** की स्थापना **पासी राजा सलीहा पासी** ने की थी।
- उनका **गणराज्य 14वीं शताब्दी तक सई–गोमती के दोआब क्षेत्र** में फैला हुआ था।
- 14वीं शताब्दी के अंत में **दिल्ली के सुल्तान नसीरुद्दीन शाह के सेनापति सैयद मखदूम अलाऊद्दीन** ने सन्डीला पर आक्रमण किया और **राजा सलीहा पराजित** हुए।
- इस पराजय के बाद **सन्डीला और निकटवर्ती पासी गणराज्यों का अंत** हो गया, जिससे पासी समाज की **राजनैतिक व आर्थिक स्थिति** तेजी से गिरती चली गई।
***
## 2. मलीहाबाद और लखनऊ का पासी साम्राज्य
- **सलीहा पासी के भाई मलीहा पासी** ने **लखनऊ जनपद की तहसील मलीहाबाद** की स्थापना की, जो आज **दशहरी आम** के लिए प्रसिद्ध है।
- **लखनऊ** कभी **राजा बिजली पासी** की राजधानी थी, जिनका **विशाल साम्राज्य** आज के **बाराबंकी, फैजाबाद, उन्नाव, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, हरदोई, लखनऊ, रायबरेली, बहराइच** आदि जनपदों पर विस्तृत था।
- **विलियम क्रूक** के अनुसार, राम के बाद अयोध्या का राज्य तीन भागों में बँट गया, जिसमें **अयोध्या के पश्चिमी भाग पर पासी राजाओं का आधिपत्य** था।
- **महाराजा बिजली पासी के बारह किलों** का उल्लेख आज भी सरकारी अभिलेखों में मिलता है, जैसे:
- लखनऊ शहर स्थित महाराजा बिजली पासी किला
- बिजनौरगढ़, नटवाडीह, माती, परवा पश्चिम, कल्ली पश्चिम, पुराना किला, औरावां, दादूपुर, भटगांव, ऐन, पिपरसंड आदि।
***
## 3. भर–पासी राज्य और टीलों का साक्ष्य
- **श्री वी. सी. शर्मा** के अनुसार, **भरपासी राज्यों का विस्तार** आज भी **अमेठी, गोसाईंगंज, महोना, मोहनलालगंज** आदि क्षेत्रों में फैले “**भर टीलों**” से प्रमाणित होता है।
- इन टीलों को स्थानीय लोकमत में “**भरपासी टीला**” कहा जाता है, जो भरपासी राज्य के अवशेष माने जाते हैं।
- गजेटियर में यह भी लिखा है कि **भरपासी राज्य का विशाल क्षेत्र** इस क्षेत्र में विद्यमान था।
***
## 4. महाराजा सुहेलदेव पासी और बहराइच
- **जनपद बहराइच** के **पासी राजा सुहेलदेव** ने **काबुल के बादशाह के पुत्र सैयद सालार मसूद गाजी** को युद्ध में परास्त कर दिया था।
- आज भी **सैयद सालार मसूद गाजी के मजार पर मेला** लगता है, जबकि **महाराजा सुहेलदेव पासी** की यादगार लगभग नहीं है, जो लेखक के अनुसार **ऐतिहासिक अन्याय** है।
- लेखक का सुझाव है कि **सरकार को सुहेलदेव पासी जैसे शूरवीर राजाओं के नाम पर स्मारक और शोध पुस्तकें** प्रकाशित करनी चाहिए।
## 5. लखीमपुर खीरी और पासी राजधानी
- **लखीमपुर खीरी** के बड़े भू–भाग पर **पासी राज्य** रहा।
- **खीरी जिला गजेटियर (1979)** के अनुसार, **धौरहरा** की उत्पत्ति **देवरहा** से है, जहाँ **माता स्थान का ध्वंस मंदिर** है और परम्परा के अनुसार **यहाँ पासी राज्य की राजधानी थी।
- गजेटियर में यह भी लिखा है कि 9वीं शताब्दी के आसपास पासी और अन्य आदिम जातियों** ने क्षेत्र पर अधिकार किया था, लेकिन बाद में **राजपूत और मुस्लिम आक्रमणकारियों** के कारण उनके शासन के चिन्ह लुप्त हो गए।
आज पासी जाति के उपजाति -राजपासी, राजवंशी, अर्कवंशी, त्रिशूलिया, कमानी, व्याधा, खटीक, भरपासी, रावत,कैथवास,खटीक,अरख इत्यादि आज भी पासी समाज में है! लेकिन एक राजनीतिक पार्टी पासी समाज के उपजाति का दावा करने के लिए उभरी और उसने माँग किया कि रजहर पासी जाति के उपजाति है उसे SC कैटिगरी का आरक्षण देना चाहिए, लेकिन मायाबती ने OBC से SC कैटेगरी लाने से इनकार कर दिया!
उसके बाद रजहर,बियार, बिंद भरुआ कहार ने श्रयंत्र के साथ रजहर से उसे राजभर कर दिया उसके बाद बियार भरुआ कहार बिंद रजहर इत्यादि मिलकर भारपासी जो भारशिव नागवंशी पासी पे अपना दावा ठोक दिया और अब तो पासी समाज के सभी राजाओं महाराजाओं को अपना बताने लगा है! 🤣
18 वी सदी के इतिहासकार हो या 1970 के पहले के इतिहासकार हो किसी ने राजभर जाति का कही उल्लेख नहीं किया और दूर दूर तक ऐतिहासिक पन्नों में नहीं मिलता है, अब इससे पूछा गया कि राजभर तो कोई जाति ही नहीं है तो फिर क्यों बोलते है तो बियार बिंद भरुआ कहार रजहर इत्यादि ने बोलना चालू कर दिया कि हम ही ऑरिजनल भर है!🤣
पासी के ऐतिहासिक पन्नों में सभी जगह उल्लेख होने के साथ पासी के एक समूह है जो साल में एक बार पासी समाज के घर घर जाकर अपने इतिहास को बताता है वह आज भी पासी समाज को पीढ़ी पर पीढ़ी जिन्दा कर रखा है!
साथ ही महाराजा त्रिलोकचंद्र पासी के इतिहास पढ़ने से पासी उपाधि कैसे धारण किया भारशिव नागवंशी पासी समाज ने वह बताता है!
इतिहास के पन्नों में कही दूर दूर तक उल्लेख नहीं मिलता बियार, बिंद, भरुआ कहार रजहर जो आज राजभर लिखना चालू किया और चलकी से भर नाम से जाति प्रमाण पत्र बना लिया है लेकिन जाँच की जाए उसके दादा के दादा का इतिहास निकाला जाए तो अलग ही जाति होगा,किसकी उपजाति है पता नहीं, भारशिव नागवंशी पासी की उपजाति नहीं है!?
- थैलियम की खोज: 1861 में, उन्होंने स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग करके थैलियम नामक तत्व की खोज की और उसके गुणों का अध्ययन किया।
- क्रूक्स ट्यूब (Crookes Tube): उन्होंने एक उच्च-निर्वात नली (Vacuum Tube) विकसित की, जिसे 'क्रूक्स ट्यूब' कहा जाता है, जिसका उपयोग कैथोड किरणों के व्यवहार को प्रदर्शित करने के लिए किया गया।
- रेडियोमीटर: उन्होंने एक ऐसा उपकरण बनाया जो प्रकाश विकिरण को घूर्णी गति में परिवर्तित करता है, जिसे क्रूक्स रेडियोमीटर के नाम से जाना जाता है।
- रेडियोधर्मिता: उन्होंने रेडियोधर्मी पदार्थों का भी अध्ययन किया, जिसे 'पदार्थ की चौथी अवस्था' (Fourth State of Matter) माना गया।
- वैज्ञानिक पत्रकारिता: उन्होंने केमिकल न्यूज़ नामक विज्ञान पत्रिका की स्थापना की और उसका संपादन किया।
***
## 6. सीतापुर और खैरा पासी
- **सीतापुर जनपद** के **खैराबाद परगने** की स्थापना **राजा खैरा पासी** ने की थी।
- **गजेटियर “Provinces of Avadh, Vol. II (1877)”** में लिखा है कि **11वीं शताब्दी में खैरा पासी** ने इस नगर की **आधारशिला रखी**।
- इस स्थान को पहले **मसिचैत / मसिचित्र** कहा जाता था और यह **महान विक्रमादित्य के शासनकाल** में एक **तीर्थस्थल** था।
***
## 7. पासी राज्यों के इतिहास की उपेक्षा
- पासी राजाओं, उनके **किलों, सामाजिक–आर्थिक स्थिति, धार्मिक व्यवस्था** आदि पर **आज तक कोई ठोस शोध नहीं** हुआ है।
- इस कारण **पासी राज्यों का इतिहास बिखरा पड़ा** है और उसे **सुव्यवस्थित रूप से संकलित** नहीं किया गया है।
- लेखक का सुझाव है कि:
- **पासी समाज की स्वयंसेवी संस्थाएँ** इस इतिहास को एकत्र करें।
- **सरकार को पासी राजाओं पर शोध** करवाना चाहिए और **शूरवीर पासी राजाओं पर पुस्तकें** प्रकाशित करनी चाहिए, ताकि उनका योगदान इतिहास में स्थायी रूप से दर्ज हो सके।
***
यदि आप चाहें तो इसी लेख को **छोटे लेख/प्रस्तुति के रूप में**, या **पासी राजाओं की कालक्रमिक सूची**, या **स्कूल–कॉलेज प्रोजेक्ट के लिए संक्षिप्त सारांश** में भी तैयार कर सकता हूँ।

Post a Comment