छीता पासी कौन थे और इतना चर्चा क्यों हो रहा है सोशल मीडिया पर -
महाराजा छीता (छिता / छितिया) पासी सीतापुर क्षेत्र के एक प्रसिद्ध पासी राजा थे, जिन्हें स्थानीय इतिहास और पासी समाज में एक शक्तिशाली शासक, न्याय‑प्रिय राजा और बाद में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोही नेता के रूप में याद किया जाता है। जन्म, समय और पहचानउनका सटीक जन्म‑तिथि स्रोतों में स्पष्ट नहीं है, लेकिन अधिकांश लोक‑इतिहास और गजेटियर‑आधारित लेखन उन्हें 12वीं–13वीं शताब्दी का शासक मानते हैं। कुछ आधुनिक स्मारक‑कार्यक्रमों में उनकी जयंती 2 फरवरी को मनाई जाती है, जिसे उनकी जन्म‑तिथि के रूप में लोक‑परंपरा में रखा गया है।छितियापुर → सीतापुरसीतापुर जिले का प्राचीन नाम “छितियापुर” था, जो महाराजा छीता पासी के नाम पर पड़ा माना जाता है; उन्होंने यहाँ एक नगर और किला बसाया था। गजेटियर और ऐन‑ए‑अकबरी जैसे स्रोत बताते हैं कि समय के साथ “छितियापुर” अपभ्रंश होकर सीतापुर बन गया, जो आज उत्तर प्रदेश का एक जिला मुख्यालय है। राजनीतिक और सैन्य भूमिकाछीता पासी को कन्नौज के राजा जयचंद के समकालीन बताया जाता है; गंजार (आधुनिक सीतापुर‑उन्नाव‑हरदोई क्षेत्र) के पासी राजाओं में वे एक प्रमुख नेता थे। जयचंद ने गंजार से कर वसूलने के लिए कई बार चढ़ाई की, लेकिन पासी राजाओं की संयुक्त शक्ति के आगे वह लगभग 12 वर्षों तक सफल नहीं हो पाया और पराजित भी हुआ। इस संघर्ष में महाराजा बिजली पासी के नेतृत्व में गंजार के सभी पासी राजाओं ने मोर्चाबंदी की, जिसमें छीता पासी का नाम भी आता है।किला और शासन‑शैलीछीता पासी का किला आज भी सीतापुर‑लखनऊ मार्ग पर, प्लाईवुड फैक्ट्री के पास भग्नावशेष के रूप में मौजूद है; यहाँ उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित है। कहा जाता है कि वे अपनी प्रजा के कल्याण के लिए शासन करते थे, जिससे उनकी छवि एक न्यायप्रिय और संरक्षक राजा के रूप में बनी। मुगलों और अंग्रेजों से संघर्षकुछ स्रोत उन्हें मुगलों के खिलाफ भी लड़ता हुआ राजा बताते हैं, हालाँकि यह अधिकतर मौखिक परंपरा पर आधारित है। 19वीं सदी में उनके वंशज या उनके नाम से जुड़े विद्रोही नेता के रूप में छीता पासी का नाम 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में आता है, जब सीतापुर क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह हुआ। लोक‑कथाओं के अनुसार अंग्रेजों ने उन्हें धोखे से पकड़कर फांसी दे दी, जिसके बाद उनकी शहादत को एक वीर‑संदेश के रूप में याद किया जाता है। आज की पहचान और सामाजिक महत्वसीतापुर और आस‑पास के इलाकों में छीता पासी को आज भी पासी समाज के गौरव‑प्रतीक के रूप में पूजा और सम्मान दोनों से याद किया जाता है; उनकी मूर्ति वाले किले पर राजनेता और समाज के लोग दर्शन के लिए आते हैं। हर साल 2 फरवरी को उनकी जयंती धूमधाम से मनाई जाती है, जिसमें समाज‑संगठन, राजनेता और आम लोग उनके नाम पर न्याय, समानता और सामाजिक गौरव के संदेश को दोहराते हैं। अगर चाहें तो आपके लिए एक फेसबुक/रील के लिए छोटा‑सा “महाराजा छीता पासी – संपूर्ण इतिहास” वाला स्क्रिप्ट भी बना सकता हूँ, जिसमें ऊपर दिए गए सारे पॉइंट्स को 2–3 मिनट के वीडियो के लिए बाँट दूँगा।
आल्हा–ऊदल के साथ पासी राजाओं का विरोध इसी दौरान गंजार के दूसरे पासी राजा महाराजा बिजली पासी और महाराजा सातन पासी ने आल्हा–ऊदल के खिलाफ भी युद्ध लड़ा, जिसमें कई अनसुनी कथाओं के अनुसार आल्हा–ऊदल को पराजय होने के साथ गंभीर घायल हुआ जिसे बचाने बेटा इंदल आया वह भी घायल हुआ। आल्हा और ऊदल दोनों की आगे चलकर मृत्यु हो गई!यानी आल्हा–ऊदल ने छीता पासी को छल से हराया, लेकिन गंजार के अन्य पासी राजाओं (बिजली, सातन आदि) के साथ उनकी लड़ाइयाँ जीत‑हार के उलट‑फेर वाली गाथाएँ बन गईं। महाराजा सातन पासी के हाथों आल्हा और ऊदल गंभीर घायल हुआ उसके कारण आगे चलकर मृत्यु हो गई!

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